नीरवता

शुक्रवार, जून 25, 2004

हाय...ये बेवफाई

सुना है, आजकल जिन सॉफ्टवेअर संस्थाओं से कर्मचारी का बडी संख्या में पलायन हो रहा है, वहाँ के नियोक्ता ग़ालिब का एक शेर पढते है -

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हमको उनसे वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है

गुरुवार, जून 24, 2004

दोहरे मापदंड

कही अनकही की लेखिका पद्मजा, जो मेरी सहकर्मी भी है, ने सुबह ही मुझे एक ई-मेल भेजा। वो आलेख एक ऐसी लडकी का वृत्तांत है, जो अपना पोस्ट ग्रेजुएशन लगभग समाप्त कर ही चुकी थी और जैसा कि सामान्यतः होता है - नौकरी की तलाश में थी।

उसने टाटा कम्पनी में नौकरी का विज्ञापन देखा। मगर उस विज्ञापन में एक बात विशेष रूप से उल्लेखित थी कि 'कृपया महिलाएँ आवेदन ना करें' । इस बात ने उसे आहत भी किया और क्रोधित भी। उसने भावावेश में जे. आर. डी. को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। समयाभाव के कारण पुरा वृत्तांत तो लिख नहीं सकता, संक्षेप में - उसे वो नौकरी मिल गई।

इस घटना नें मुझे और मेरी तनहाई को चर्चा हेतु एक विषय प्रदान कर दिया। मुझे तो उसके आहत होने पर ही आपत्ति है। अचानक लगा कि 'फिमेल ईगो' भी अस्तित्व में आ गया है। कई ऐसी नौकरीयाँ भी है जहाँ पुरुषों को भी कम प्राथमिकता दी जाती है जैसे किसी कर्यालय में 'रिसेप्शनिस्ट' या 'निजी सलाहकार' का पद। मगर शायद ही किसी पुरुष ने आपत्ति जताई हो। और फिर, कई पदों की कुछ शर्ते भी होती है जिन्हें पुरी करना महिला उम्मीदवारों के लिए तुलनात्मक रूप से ज़्यादा कठिन होती है जैसे सामान्य से ज़्यादा समय काम करना, रात्रीकालीन पाली में काम करना, सतत भ्रमण की आवश्यकता इत्यादि।

जो महिलाएँ सचमुच ही लिंगभेद का विरोध करती है, वो उस समय कहाँ जाती है जब संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग की जाती है, जब कई घरों में बेचारे 'वो' ही कमाने की मशक्कत करते रहते है, जब आयकर के मुल्यांकन में केवल महिला होने के आधार पर विशेष छुट का लाभ लिया जाता है, और तो और जब केवल महिला होने के आधार पर पेट्रोल पंपों और सिनेमाघरों पर लगी लम्बी कतारों में प्राथमिकता मिलती है।

मैं उन लोगों से बिलकुल भी सहमत नहीं हो पाता हूँ जो दोहरे मापदंडो से जीवन जीते है।

बुधवार, जून 23, 2004

काव्यांजली...

ओशो अपने प्रवचनों में कई बार कविताओं या शायरीयों का प्रयोग कर उन्हें और भी श्रवणीय बना देते थे, ये कविताएँ उनके चाहने वाले उन्हें भेजा करते थे, कहना न होगा, ओशो की काव्य के प्रति समझ उतनी ही अथाह थी जितना उनका 'दर्शन', प्रस्तुत है आपके रसास्वादन हेतु एक बानगी जो मुझे बेहद पसंद है-

बिन देखे ऐसी लगन लगी
दर्शन होगा तो क्या होगा

सुनता हूँ रूप-गर्विता है, धरती पर पाँव नहीं पडते
वो नशा चढा अपनेपन का, औरों पर नयन नहीं मुडते
सिंगार समय उसके सम्मुख, दर्पण होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

सुनता हूँ मैं उसकी पलकें, बिन आंजे(अंजन) ही कजरारी है
दृग नीले इतने, सागर की गहराई जैसे पी ली है
जब उसकी बडरी आँखों में, अंजन होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

सुनता हूँ उसके अधर-सुधर, फुलों को हंसी सिखाते है
उसकी वाणी से वर पाने, सरगम के स्वर ललचाते है
उन अधरों पर जब प्रेम भरा गायन होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

मंगलवार, जून 22, 2004

समग्र स्वीकृति का अभाव

कल ही मैंने अपने मछलियों के जलाशय परिवार में थोडा इज़ाफा किया। मैंने दो नये सदस्यों को उसमें शामिल किया। वैसे मेरे मछलीघर का दस सदस्यीय परिवार काफी मज़े में था मगर सभी सुनहरे रंग की है और मैं एक काली भी चाहता था। काले रंग के प्रति मेरा आकर्षण कोई नया नहीं है।

यही मात्र ऐसा रंग है जिसपर दुजा रंग नहीं चढता। मुख्य विषय से भटकना मेरी पुरानी आदत है। खैर, जैसे ही मैंने अपनी मछलीयों का उनके नये साथियों से परिचय करवाना चाहा, मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। मैंने गौर किया कि काली मछली को स्वीकार करने में कुछ मछलियों को परेशानी हो रही थी। यहाँ तक कि वे उसे काटने की कोशिश भी करने लगी। उनकी ‘असुरक्षा की भावना’ मेरे लिए आश्चर्य का विषय थी।

तभी एक विचार मेरे अन्दर कौंधा - हम मनुष्यों का व्यवहार इससे सर्वथा भिन्न तो नही है, हम भी तो ऐसे लोगों को सरलता से स्वीकार नहीं कर पाते जो हमसे भिन्न हो। नये लोगों के प्रति ही नहीं वरन नई परिस्थितियों के प्रति भी हमारा यही रवैय्या रहता है।

सोमवार, जून 21, 2004

इस सप्ताहांत - हम तुम

इस सप्ताहांत , फिल्म देखी गई - 'हम तुम'। चलचित्र कुछ नयापन लिए हुए है, वास्तव में, मैं इसे दुबारा देख रहा था (इससे कोई ये अर्थ ना लगाए कि पहली बार मुझे फिल्म समझने में कोई दिक्कत हुई थी)। हाल ही के कई चलचित्रों की तरह इसमें हिंसा की अतिशयोक्ति भी नहीं है, और ना ही कोई उबाऊ 'फैमिली ड्रामा' । फिल्म में अजीब सी ताज़गी है और कुछ नये विषयों को छुने का साहस भी किया गया है जो प्रशंसनीय है। इसमें उन लोगों के बारे में भी कहने का प्रयास किया गया है, जो अपने 'करीयर' में कहीं इतना उलझ जाते है कि अपने परिवार की अवहेलना भी कर जाते है। लेकिन, उम्र के किसी मोड पर उन्हें अपनी इस भुल का एहसास हुए बिना नहीं रहता...

शनिवार, जून 19, 2004

कुछ हर्फ...

'नीरवता' जैसे विरोधाभासी शीर्षक को पढकर विस्मित होना स्वाभाविक है...दर असल, 'शब्द' का उद्‌गम तो 'नीरवता' ही माना गया है, और नीरवता की महिमा का बखान क्या करूँ, कईमशहूर शायरों ने इसके बारे में कुछ कहने का प्रयास मात्र किया है, जैसे -

मुँह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में, खामोशी पहचाने कौन

और,

जिस तरफ जाईये, है खोखले लफ्ज़ों का हुजुम
कौन समझे यहाँ आवाज़ की गहराई को

माना शब्द 'ब्रह्म' है, मगर उस ब्रह्म को पाने के लिए भी निःशब्द की ही सहायता लेनी पडती है। शब्द में बहुत शक्ति है लेकिन नीरवता में उससे भी अधिक है। कहते है 'मुनि' शब्द का उद्‌गम भी 'मौन' से ही हुआ है, लेकिन यहाँ मौन का अर्थ 'शाब्दिक मौन' से भी कहीं गहरा है।