नीरवता

मंगलवार, जून 22, 2004

समग्र स्वीकृति का अभाव

कल ही मैंने अपने मछलियों के जलाशय परिवार में थोडा इज़ाफा किया। मैंने दो नये सदस्यों को उसमें शामिल किया। वैसे मेरे मछलीघर का दस सदस्यीय परिवार काफी मज़े में था मगर सभी सुनहरे रंग की है और मैं एक काली भी चाहता था। काले रंग के प्रति मेरा आकर्षण कोई नया नहीं है।

यही मात्र ऐसा रंग है जिसपर दुजा रंग नहीं चढता। मुख्य विषय से भटकना मेरी पुरानी आदत है। खैर, जैसे ही मैंने अपनी मछलीयों का उनके नये साथियों से परिचय करवाना चाहा, मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। मैंने गौर किया कि काली मछली को स्वीकार करने में कुछ मछलियों को परेशानी हो रही थी। यहाँ तक कि वे उसे काटने की कोशिश भी करने लगी। उनकी ‘असुरक्षा की भावना’ मेरे लिए आश्चर्य का विषय थी।

तभी एक विचार मेरे अन्दर कौंधा - हम मनुष्यों का व्यवहार इससे सर्वथा भिन्न तो नही है, हम भी तो ऐसे लोगों को सरलता से स्वीकार नहीं कर पाते जो हमसे भिन्न हो। नये लोगों के प्रति ही नहीं वरन नई परिस्थितियों के प्रति भी हमारा यही रवैय्या रहता है।

1 Comments:

  • नीरव,

    आपने एक बहुत महत्वपूर्ण विषय उठाया है। मैंने इस और सरीखे विषयों पर एक नया ब्लाग शुरु किया है:
    http://aikalya.blogspot.com/
    लिखते-लिखते समय लगेगा क्योंकि हिन्दी कई वर्षों से प्रयुक्त करने का अवसर नहीं मिला।

    By Blogger aikalya, at 6 अक्तूबर 2006 को 1:07 am  

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