नीरवता

बुधवार, जून 23, 2004

काव्यांजली...

ओशो अपने प्रवचनों में कई बार कविताओं या शायरीयों का प्रयोग कर उन्हें और भी श्रवणीय बना देते थे, ये कविताएँ उनके चाहने वाले उन्हें भेजा करते थे, कहना न होगा, ओशो की काव्य के प्रति समझ उतनी ही अथाह थी जितना उनका 'दर्शन', प्रस्तुत है आपके रसास्वादन हेतु एक बानगी जो मुझे बेहद पसंद है-

बिन देखे ऐसी लगन लगी
दर्शन होगा तो क्या होगा

सुनता हूँ रूप-गर्विता है, धरती पर पाँव नहीं पडते
वो नशा चढा अपनेपन का, औरों पर नयन नहीं मुडते
सिंगार समय उसके सम्मुख, दर्पण होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

सुनता हूँ मैं उसकी पलकें, बिन आंजे(अंजन) ही कजरारी है
दृग नीले इतने, सागर की गहराई जैसे पी ली है
जब उसकी बडरी आँखों में, अंजन होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

सुनता हूँ उसके अधर-सुधर, फुलों को हंसी सिखाते है
उसकी वाणी से वर पाने, सरगम के स्वर ललचाते है
उन अधरों पर जब प्रेम भरा गायन होगा तो क्या होगा
बिन देखे...

2 Comments:

  • स्वागत है बंधु, हिन्दी चिट्ठा संसार में| आप इंदौर में ही कार्यरत हैं क्या? बचपन में एक बार जा चुका हूँ| यहाँ कभी कभी ईंदौर निवासियो से मुलाकात हो जाती है| मानना पड़ेगा ईंदौर और भोपाल के वाशिंदो की हिंदी पर पकड़ काफी सशक्त है| हम तो हिंदी उर्दू का घालमेल कर डालते हैं|

    By Blogger Atul Arora, at 23 जून 2004 को 6:09 pm  

  • धन्यवाद अतुलजी जो आपको हमारी हिंदी पसंद आई। कोशिश करते है कि इस मिलावटी संसार में कम से कम ये भाषा तो बिना मिलावट के रहे। रहा इंदौरी होने का प्रश्न, तो हम जन्मजात ही इंदौरी है और वर्तमान में यहीं कार्यरत है।

    By Blogger Nirav, at 3 जुलाई 2004 को 2:36 pm  

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