नीरवता

गुरुवार, जून 24, 2004

दोहरे मापदंड

कही अनकही की लेखिका पद्मजा, जो मेरी सहकर्मी भी है, ने सुबह ही मुझे एक ई-मेल भेजा। वो आलेख एक ऐसी लडकी का वृत्तांत है, जो अपना पोस्ट ग्रेजुएशन लगभग समाप्त कर ही चुकी थी और जैसा कि सामान्यतः होता है - नौकरी की तलाश में थी।

उसने टाटा कम्पनी में नौकरी का विज्ञापन देखा। मगर उस विज्ञापन में एक बात विशेष रूप से उल्लेखित थी कि 'कृपया महिलाएँ आवेदन ना करें' । इस बात ने उसे आहत भी किया और क्रोधित भी। उसने भावावेश में जे. आर. डी. को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। समयाभाव के कारण पुरा वृत्तांत तो लिख नहीं सकता, संक्षेप में - उसे वो नौकरी मिल गई।

इस घटना नें मुझे और मेरी तनहाई को चर्चा हेतु एक विषय प्रदान कर दिया। मुझे तो उसके आहत होने पर ही आपत्ति है। अचानक लगा कि 'फिमेल ईगो' भी अस्तित्व में आ गया है। कई ऐसी नौकरीयाँ भी है जहाँ पुरुषों को भी कम प्राथमिकता दी जाती है जैसे किसी कर्यालय में 'रिसेप्शनिस्ट' या 'निजी सलाहकार' का पद। मगर शायद ही किसी पुरुष ने आपत्ति जताई हो। और फिर, कई पदों की कुछ शर्ते भी होती है जिन्हें पुरी करना महिला उम्मीदवारों के लिए तुलनात्मक रूप से ज़्यादा कठिन होती है जैसे सामान्य से ज़्यादा समय काम करना, रात्रीकालीन पाली में काम करना, सतत भ्रमण की आवश्यकता इत्यादि।

जो महिलाएँ सचमुच ही लिंगभेद का विरोध करती है, वो उस समय कहाँ जाती है जब संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग की जाती है, जब कई घरों में बेचारे 'वो' ही कमाने की मशक्कत करते रहते है, जब आयकर के मुल्यांकन में केवल महिला होने के आधार पर विशेष छुट का लाभ लिया जाता है, और तो और जब केवल महिला होने के आधार पर पेट्रोल पंपों और सिनेमाघरों पर लगी लम्बी कतारों में प्राथमिकता मिलती है।

मैं उन लोगों से बिलकुल भी सहमत नहीं हो पाता हूँ जो दोहरे मापदंडो से जीवन जीते है।

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