नीरवता

बुधवार, जुलाई 21, 2004

ग़ज़लों का सफ़र...

ग़ज़ल भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। कभी कभी ग़ज़ल के एक मिसरे में इतनी बात कह दी जाती है जो कई सफों (पन्नों) पर भी लिखी नहीं जा सकती। मिसाल के तौर पर - ग़ालिब फरमाते है
 
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, के हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहोत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
 
मोहब्बत मे नहीं है, फर्क जीने और मरने का
उसी को देखके जीते है, जिस काफिर पे दम निकले
 
खुदा के वास्ते पर्दा, ना क़ाबे से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफिर सनम निकले
 
ये अशआर मेरे दिल के बहोत क़रीब है, और ज़िंदगी की हक़िकत बयान करते है। ऐसा नहीं है कि ग़ज़लों में उर्दु के बडे वज़नी और क्लिष्ट शब्दों का ही इस्तेमाल होता है, ग़ालिब जैसे बडे शायरों ने भी बडी ही सरल ज़बान का इस्तेमाल किया है, जैसे -
 
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है
 
हमको मालूम है जन्नत की हक़िक़त लेकीन
दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' ये खयाल अच्छा है
 
ग़ज़लों का ये रूमानी सफ़र युं ही जारी रहेगा...


गुरुवार, जुलाई 15, 2004

ग़ज़ल - अपनी तनहाई से गुफ्तगू

ग़ज़लों के प्रति मेरा असीम प्रेम मेरे लडकपन से ही परवान चढने लगा था। मुझे अभी भी याद है, जगजीत सिंह की वो मखमली आवाज़ मुझे लगभग सम्मोहित कर देती थी। मेरे माता-पिता को आश्चर्य होता, और सच कहूँ तो मुझे भी...

कभी कभी तो मुझे अशाअर भी समझ नहीं आते थे। पर मैं उन लोगों में अपना शुमार करता हूँ जो यकिन करते है कि ग़ज़ल सुनने की नहीं, महसूस करने की चीज़ है। इसमें दिमाग की नहीं, दिल की ज़रूरत होती है। जो सिर्फ दिमाग का ही इस्तेमाल करते है, उनके बारे में जावेद साहब खुब फरमाते है-

जानता हूँ मैं तुमको, ज़ौक-ए-शायरी भी है
शख्सियत सजाने में, इक ये माहिरी भी है
फिर भी हर्फ चुनते हो, सिर्फ लफ्ज़ सुनते हो
इनके दरमियां क्या है, तुम ना जान पाओगे...

कुछ लोग ग़ज़लों को केवल दर्द की अभिव्यक्ति भर मानते है, मगर वो ग़ज़लों का केवल एक ही पहलु जानते है। ग़ज़लों के अलावा मुझे नज़्म भी उतना ही सुकून पहुंचाती है। इन दोनों में तकनिकी अंतर इतना ही है कि ग़ज़ल का हर शेर भिन्न विषयों पर हो सकता है मगर नज़्म, पुरी, एक ही विषय पर कही जाती है।

कई ग़ज़लों में ईश्वर की ईबादत भी की जाती है, बानगी के लिए 'सजदा' एलबम की ये ग़ज़ल

कभी युं भी आ मेरी आँख में, के मेरी नज़र को खबर ना हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर ना हो

वो बडा रहीम-ओ-क़रीम है, मुझे इतनी सिफ़त अता करे
उसे भुलने की दुआ करू, तो दुआ में मेरी असर ना हो

ग़ज़लों के बारे में जितना कहें, उतना कम, बाकी का सफर अगली किश्तों में...

बात निकलेगी तो फिर दुर तलक जाएगी...

सोमवार, जुलाई 05, 2004

पार्टी की जान...

अभी हाल ही में, एक विवाह समारोह के प्रीतिभोज में आमंत्रित किया गया। मैंने सहर्ष अपनी उपस्थिती दर्ज कराई। हमेंशा की तरह मैंने अपना अवलोकन एवंम निरीक्षण प्रारंभ किया। मुझे हमेंशा से ही अपने आस-पास के लोगों के व्यक्तित्वों का निरीक्षण करना रुचिकर रहा है। मेरा विश्वास है कि कोई भी व्यक्ति, केवल अपनी उपस्थिती मात्र से ही अपने ८५ प्रतिशत व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कर देता है।

जल्द ही मुझे बारीकी से निरीक्षरणार्थ एक बडा ही विलक्षण व्यक्तित्व नज़र आया । अत्यधिक चौडी मुखाकृति, केशराशी मानो समुद्र की उफनती लहरों की अनुकृति, साँवली रंगत, विस्तृत ललाट के मध्य एक केशरिया तिलक, कानों मे रजत बाली, आँखों को और भी प्रभावी बनाने हेतु किंचीत अंजन का भी प्रयोग किया गया प्रतीत होता था। इस मझले कद-काठी के सज्जन ने चटक लाल रंग की कमीज़ और नीले रंग की जींस की पतलुन पहन रखी थी। साथ ही वर्तमान युग में अत्याधुनिकता का प्रतीक चालायमान फोन भी धारण किया हुआ था। हाथ की लगभग सभी उंगलीयों में बडे नगों वाली अंगुठीयाँ शोभायमान थी। ये सज्जन वार्तालाप तो अपने मित्रों से कर रहे थे, मगर उनके क्षुधातुर चक्षु खाने की मेज़ों पर सजाए जा रहे व्यंजनों पर लगे थे। वो तो प्रकृति की व्यवस्था है कि आँखों से लार नहीं टपकती अन्यथा ...

उनकी नेत्रों की उत्कंठता को कोई उपमा देना कठीन था । मीरा ने भी कृष्ण के दर्शन हेतु इतनी व्यग्रता कदाचित न दिखाई हो। मैंने देखा वे कई बार अपने मित्रों से भोजन आरंभ करने का औपचारिकतावश आग्रह कर चुके थे, परंतु जब उनसे और प्रतीक्षा करना कठीन हो गया तो उन्होंने अपनी मित्रता को ताक पर रखना ही उचित समझा...और चल दिये। प्रथम अवसर में ही सारे व्यंजनों से थाल भर लेने के पश्चात भी वे निश्चिंत हो जाना चाहते थे कि कहीं उनकी (निरमा वाली दिपीका जी जैसी) पारखी नज़रों से कुछ छुट तो नहीं गया है। निश्चिंत हो जाने पर, उन्होने खाना 'डकारने' का महत कार्य आरंभ किया।मैं बाध्य हूँ 'डकारने' जैसे अशिष्ठ शब्द का प्रयोग करने के लिए...क्योंकि चार निवालों का एक निवाला बना कर, मुँह में भरकर, अपनी दंतपंक्तियों को चबाने का कष्ट ना देते हुए गटक जाने की क्रिया के लिए हिंदी भाषा में इससे उपयुक्त शब्द शायद ही कोई और हो।

खाते खाते अघा जाने के पश्चात, उन्हें मजबूर होकर थाली रख देनी पडी। मगर भोजन से ये विमुखता उन्हें ज़्यादा देर रास न आई, और इस भोज में सर्वाधिक प्रिय ऐसे व्यंजनों की ओर फिर अपना रूख किया। पापड और मिष्ठान्न जैसे खाद्य पदार्थो से उनके करकमल फिर सुशोभित थे। इस बार अपने आस-पास खडे बच्चों पर भी उनका प्रेम छलक पडा, जो निकट ही खडे उनकी असाधारण खाने की क्षमता से अभिभुत हुए जा रहे थे।

इन सब बातों के अलावा उनके व्यक्तित्व के एक और उल्लेखनीय पक्ष से मेरा परिचय हुआ - उन्होंने गले में एक सोने की जंजीर पहन रखी थी जो बडे ही सुव्यवस्थित एवंम सुविचारित रूप से आधी कमीज़ के अंदर और आधी बाहर रखी गई थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा करने का औचित्य क्या था...स्पष्ट था कि जंजीर, भोज में पधारे अन्य अतिथीयों के दर्शनार्थ रखी गई थी। ये मुए आजकल के दर्ज़ी भी...इतनी ऊँची कॉलर रख देते है कि मुल्यवान वस्तुएँ कहीं छुप जाती है। जंजीर कहीं फिर से ओझल ना हो जाए इसकी भी समुचित व्यवस्था की गई थी। उसे बडे जतन से कमीज़ की दो बटनों मे मध्य से निकाला गया था।

संक्षेप में, यही लिखते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम दूँगा कि जब तक वे श्रीमान वहाँ उपस्थित रहें, अनवरत प्रयासरत रहे कि प्रितीभोज कार्यक्रम की जान और शान वे ही बने रहे।