नीरवता

सोमवार, जुलाई 05, 2004

पार्टी की जान...

अभी हाल ही में, एक विवाह समारोह के प्रीतिभोज में आमंत्रित किया गया। मैंने सहर्ष अपनी उपस्थिती दर्ज कराई। हमेंशा की तरह मैंने अपना अवलोकन एवंम निरीक्षण प्रारंभ किया। मुझे हमेंशा से ही अपने आस-पास के लोगों के व्यक्तित्वों का निरीक्षण करना रुचिकर रहा है। मेरा विश्वास है कि कोई भी व्यक्ति, केवल अपनी उपस्थिती मात्र से ही अपने ८५ प्रतिशत व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कर देता है।

जल्द ही मुझे बारीकी से निरीक्षरणार्थ एक बडा ही विलक्षण व्यक्तित्व नज़र आया । अत्यधिक चौडी मुखाकृति, केशराशी मानो समुद्र की उफनती लहरों की अनुकृति, साँवली रंगत, विस्तृत ललाट के मध्य एक केशरिया तिलक, कानों मे रजत बाली, आँखों को और भी प्रभावी बनाने हेतु किंचीत अंजन का भी प्रयोग किया गया प्रतीत होता था। इस मझले कद-काठी के सज्जन ने चटक लाल रंग की कमीज़ और नीले रंग की जींस की पतलुन पहन रखी थी। साथ ही वर्तमान युग में अत्याधुनिकता का प्रतीक चालायमान फोन भी धारण किया हुआ था। हाथ की लगभग सभी उंगलीयों में बडे नगों वाली अंगुठीयाँ शोभायमान थी। ये सज्जन वार्तालाप तो अपने मित्रों से कर रहे थे, मगर उनके क्षुधातुर चक्षु खाने की मेज़ों पर सजाए जा रहे व्यंजनों पर लगे थे। वो तो प्रकृति की व्यवस्था है कि आँखों से लार नहीं टपकती अन्यथा ...

उनकी नेत्रों की उत्कंठता को कोई उपमा देना कठीन था । मीरा ने भी कृष्ण के दर्शन हेतु इतनी व्यग्रता कदाचित न दिखाई हो। मैंने देखा वे कई बार अपने मित्रों से भोजन आरंभ करने का औपचारिकतावश आग्रह कर चुके थे, परंतु जब उनसे और प्रतीक्षा करना कठीन हो गया तो उन्होंने अपनी मित्रता को ताक पर रखना ही उचित समझा...और चल दिये। प्रथम अवसर में ही सारे व्यंजनों से थाल भर लेने के पश्चात भी वे निश्चिंत हो जाना चाहते थे कि कहीं उनकी (निरमा वाली दिपीका जी जैसी) पारखी नज़रों से कुछ छुट तो नहीं गया है। निश्चिंत हो जाने पर, उन्होने खाना 'डकारने' का महत कार्य आरंभ किया।मैं बाध्य हूँ 'डकारने' जैसे अशिष्ठ शब्द का प्रयोग करने के लिए...क्योंकि चार निवालों का एक निवाला बना कर, मुँह में भरकर, अपनी दंतपंक्तियों को चबाने का कष्ट ना देते हुए गटक जाने की क्रिया के लिए हिंदी भाषा में इससे उपयुक्त शब्द शायद ही कोई और हो।

खाते खाते अघा जाने के पश्चात, उन्हें मजबूर होकर थाली रख देनी पडी। मगर भोजन से ये विमुखता उन्हें ज़्यादा देर रास न आई, और इस भोज में सर्वाधिक प्रिय ऐसे व्यंजनों की ओर फिर अपना रूख किया। पापड और मिष्ठान्न जैसे खाद्य पदार्थो से उनके करकमल फिर सुशोभित थे। इस बार अपने आस-पास खडे बच्चों पर भी उनका प्रेम छलक पडा, जो निकट ही खडे उनकी असाधारण खाने की क्षमता से अभिभुत हुए जा रहे थे।

इन सब बातों के अलावा उनके व्यक्तित्व के एक और उल्लेखनीय पक्ष से मेरा परिचय हुआ - उन्होंने गले में एक सोने की जंजीर पहन रखी थी जो बडे ही सुव्यवस्थित एवंम सुविचारित रूप से आधी कमीज़ के अंदर और आधी बाहर रखी गई थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा करने का औचित्य क्या था...स्पष्ट था कि जंजीर, भोज में पधारे अन्य अतिथीयों के दर्शनार्थ रखी गई थी। ये मुए आजकल के दर्ज़ी भी...इतनी ऊँची कॉलर रख देते है कि मुल्यवान वस्तुएँ कहीं छुप जाती है। जंजीर कहीं फिर से ओझल ना हो जाए इसकी भी समुचित व्यवस्था की गई थी। उसे बडे जतन से कमीज़ की दो बटनों मे मध्य से निकाला गया था।

संक्षेप में, यही लिखते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम दूँगा कि जब तक वे श्रीमान वहाँ उपस्थित रहें, अनवरत प्रयासरत रहे कि प्रितीभोज कार्यक्रम की जान और शान वे ही बने रहे।

6 Comments:

  • मान गए भई आपकी कलम की धार को नीरव जी। "चौडी मुखाकृति, केशराशी मानो समुद्र की उफनती लहरों की अनुकृति", गद्य के साथ आप पद्य पर भी खासी पकड़ रखते हैं, जान पड़ता है।

    By Blogger Debashish, at 5 जुलाई 2004 को 6:24 pm  

  • कभी खाने पीने का कोई ओलंपिक हुआ तो कम से कम हम उसमें स्वर्ण पदक ला सकते हैं :).

    By Blogger Shail, at 5 जुलाई 2004 को 9:47 pm  

  • शुक्र मनाइए। दक्षिण भारतीय शादियों में तो खाना भी कुछ खास नहीं होता।

    By Blogger आलोक, at 7 जुलाई 2004 को 8:31 pm  

  • भाई नीरव जी
    आप तो गद्य लेखन में भी धाकड़ हैं| दिल की बात कहूँ तो गजल व कविता मेरे सर के ऊपर से निकल जाते हैं‌ अपनी समझ अब तक सिर्फ टेम्पो के पिछले हिस्से में पायी जाने वाली तुकबंदी तक सीमित थी पर आपके और रतलामी जी के ब्लाग ने फिर से रूचि जगा दी है| साथ ही आपने जो मेरे ब्लाग की प्रशंसा की है उसके लिए तहेदिल से शुक्रिया , भाई हमारे ब्लाग ईतनी तारीफ के काबिल तो नहीं पर हौसलाअफजाई से लेखनी में दम बरकरार रहता है|

    By Blogger Atul Arora, at 28 जुलाई 2004 को 1:29 am  

  • भाई नीरव जी
    आप तो गद्य लेखन में भी धाकड़ हैं| दिल की बात कहूँ तो गजल व कविता मेरे सर के ऊपर से निकल जाते हैं‌ अपनी समझ अब तक सिर्फ टेम्पो के पिछले हिस्से में पायी जाने वाली तुकबंदी तक सीमित थी पर आपके और रतलामी जी के ब्लाग ने फिर से रूचि जगा दी है| साथ ही आपने जो मेरे ब्लाग की प्रशंसा की है उसके लिए तहेदिल से शुक्रिया , भाई हमारे ब्लाग ईतनी तारीफ के काबिल तो नहीं पर हौसलाअफजाई से लेखनी में दम बरकरार रहता है|

    By Blogger Atul Arora, at 28 जुलाई 2004 को 1:29 am  

  • Achchhi baat hai.. achchha laga ye jaan kar ki blogs hindi me bhi likhe jaane lage hain.. pahli baar dekha aur bahut achchhi anubhuti hui hai. Abhi parikshaye chal rahi hain. kuchh dino ke baad dekhunga aur kuchh likhunga bhi
    dhanyawad

    By Blogger कुमार मानवेन्द्र, at 14 सितंबर 2005 को 1:04 am  

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