नीरवता

गुरुवार, जुलाई 15, 2004

ग़ज़ल - अपनी तनहाई से गुफ्तगू

ग़ज़लों के प्रति मेरा असीम प्रेम मेरे लडकपन से ही परवान चढने लगा था। मुझे अभी भी याद है, जगजीत सिंह की वो मखमली आवाज़ मुझे लगभग सम्मोहित कर देती थी। मेरे माता-पिता को आश्चर्य होता, और सच कहूँ तो मुझे भी...

कभी कभी तो मुझे अशाअर भी समझ नहीं आते थे। पर मैं उन लोगों में अपना शुमार करता हूँ जो यकिन करते है कि ग़ज़ल सुनने की नहीं, महसूस करने की चीज़ है। इसमें दिमाग की नहीं, दिल की ज़रूरत होती है। जो सिर्फ दिमाग का ही इस्तेमाल करते है, उनके बारे में जावेद साहब खुब फरमाते है-

जानता हूँ मैं तुमको, ज़ौक-ए-शायरी भी है
शख्सियत सजाने में, इक ये माहिरी भी है
फिर भी हर्फ चुनते हो, सिर्फ लफ्ज़ सुनते हो
इनके दरमियां क्या है, तुम ना जान पाओगे...

कुछ लोग ग़ज़लों को केवल दर्द की अभिव्यक्ति भर मानते है, मगर वो ग़ज़लों का केवल एक ही पहलु जानते है। ग़ज़लों के अलावा मुझे नज़्म भी उतना ही सुकून पहुंचाती है। इन दोनों में तकनिकी अंतर इतना ही है कि ग़ज़ल का हर शेर भिन्न विषयों पर हो सकता है मगर नज़्म, पुरी, एक ही विषय पर कही जाती है।

कई ग़ज़लों में ईश्वर की ईबादत भी की जाती है, बानगी के लिए 'सजदा' एलबम की ये ग़ज़ल

कभी युं भी आ मेरी आँख में, के मेरी नज़र को खबर ना हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर ना हो

वो बडा रहीम-ओ-क़रीम है, मुझे इतनी सिफ़त अता करे
उसे भुलने की दुआ करू, तो दुआ में मेरी असर ना हो

ग़ज़लों के बारे में जितना कहें, उतना कम, बाकी का सफर अगली किश्तों में...

बात निकलेगी तो फिर दुर तलक जाएगी...