नीरवता

शुक्रवार, सितंबर 03, 2004

मुम्बई का जीवन

अपने नाम को ही चरितार्थ करते हुए, एक लम्बे अंतराल के बाद, मेरी वापसी कि मुझे प्रसन्नता है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी अपने से कई दिनों बाद फिर से मुलाकात हो रही है। ये विरह की घडीयां मैने मुम्बई मे बिताई। अपनी कम्पनी के किसी कार्य से मुझे जाना पडा था। वहां अभी भी मेरे कई साथी रहते है।

देखा जाय तो मुझे मुम्बई की भाग-दौड वाली जीवन शैली ज़रा भी नहीं सुहाती है। एक मशीनी जीवन - जिसे मैं कागज़ के फुलों की उपमा देना पसंद करूँगा, जो देखने में आकर्षक होते है, मुरझाते भी नहीं मगर वे जीवंतता की प्रतीक - मधुर सुवास से रहीत होते है। मै तो कायल हूँ उन फुलों का जो सुबह खिलते है और शाम को मुरझा जाते है, लेकिन अपने उस छोटे से जीवनकाल में भी, अपनी उपस्थिती शिद्दत से अनुभव कराते है।

छोटे शहरों मे आदमी के पास एक अवकाश, एक अंतराल होता है; वो ज़िंदगी जीता है, जबकि मुम्बई जैसे शहरों में ज़िंदगी काटी जाती है। हर इंसान एक अनजानी सी चाहत लिये अज्ञात लक्ष्य के पीछे दौडता सा दिखाई देता है। निदा फाज़ली साहब की ये ग़ज़ल मुझे बरबस ही याद आ जाती है -


हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी

हर तरफ दौडते-भागते रास्ते
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी

ज़िंदगी का मुकद्दर सफर-दर-सफर
आखरी सांस तक बेकरार आदमी