नीरवता

मंगलवार, अक्तूबर 05, 2004

भिया(ओ), अग्गे से 'हेड' दो...

हिन्दी दिवस के उपलक्ष में अभी कुछ ही दिनों पुर्व एक परिचीत से हुई वार्तालाप स्मरण हो आई। मैने उनके कथन में सत्यता पाई कि मध्य प्रदेश की अपनी कोई भाषा नहीं है। जिस प्रकार महाराष्ट्र में मराठी, गुजरात में गुजराती और दक्षिण भारतीय प्रदेशों में जितनी प्रमुखता से वहाँ की प्रादेशीक भाषाओं का उपयोग किया जाता है, वैसा भाषाई प्रेम मध्य प्रदेश में हिन्दी के प्रति नहीं दिखाई देता है। कदम कदम पर लोग अलग ही प्रकार की स्वनिर्मीत हिन्दी बोलते सुने जा सकते है। ऐसा नहीं है कि दुसरे प्रदेशों में भाषा अपने शुध्दतम स्वरूप में होती है, लेकिन उतनी नष्ट-भ्रष्ट भी नहीं होती जितनी यहाँ पर। भाषाई शुध्दता पर मेरा उतना भी दुराग्रह नहीं, जितना की ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित एक फिल्म में, धमेर्ंद्र अभिनीत चरित्र द्वारा दिखाया गया था। परंतु मै भाषायी विविधता रूपी उस अपभ्रंशता से भी सहमत नहीं हो पाता जहाँ 'भैय्या' को 'भिया(ओ)' और 'आगे' को 'अग्गे' कहा जाता हो। ऐसे शब्दों के उदाहरण कम नहीं जो अपने मुल स्वरूप से बहुत दुर जा चुके है - इनमें 'श' को 'स' उच्चारित करने वाले 'ज्ञानीजन' भी अपना योगदान देते है। माना कि ऐसे लोगों में ज़्यादातर वे ही है जिनकी शिक्षा का स्तर सामान्य से नीचे है। मगर मैने कई उच्च शिक्षित लोगों को भी इससे ग्रसित पाया है। कई लोगों के अनुसार भाषा का मुल उद्देश्य केवल भावनाओं की अभिव्यक्ती मात्र है, दुसरे शब्दों में, अगर भाषा का अपभ्रंशित रूप यदि इस उद्देश्य की पुर्ती करता है तो स्वीकार्य होना चाहिये। मैं भी निर्विरोध इस बात का पक्षधर हूँ कि एक श्रमिक को साहित्यिक भाषा का ज्ञान होना अनावश्यक है। परंतु बात जब शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत लोगों की हो तो ये अपेक्षा व्यर्थ नहीं कही जा सकती। मेरे मतानुसार अगर बचपन में ही भाषा के सही स्वरूप से माता-पिता और शिक्षक परिचीत करा सकें तो ये समस्या का सरलतम निदान होगा। इन लोगों को अपनी महत्वपुर्ण भुमिका का ज्ञान न होना ही समस्या को और भी जटिल बना रहा है।

8 Comments:

  • नीरव जी, मै आपकी बातो से पूरी तरह सहमत हूँ.....मध्य प्रदेश के बारे मुझे एक चुटकला याद आता है..(इसे चुटकले की तरह ही ले, दिल पर मत ले.)

    एक जनाब म.प्र.पधारें, उनको यहाँ की भाषा देख कर बड़ी कोफ्त हुई, कि हिन्दी का सत्यानाश किया जा रहा है.उन्होने देखा हर व्यक्ति यहाँ है को हाउ बोलता है.उन्हे समझ मे नही आया सो किसी राह चलते ज्ञानी जन को पकड़ा और उनसे यह वार्तालाप कीः

    मित्रः"जनाब यहाँ लोग है को हाउ क्यों बोलते है.?"
    ज्ञानीजी बोलेः "यहाँ लोग कम पढे लिखे है ना इसलिये है को हाउ बोलते है"
    मित्रः"क्या आप पढे लिखे है?"
    ज्ञानीजीः "हाउ"



    किसी अशिष्टता के लिये माफी चाहूँगा.

    By Blogger Jitendra Chaudhary, at 10 अक्तूबर 2004 को 1:04 pm  

  • अरे! नहीं नहीं जीतेंद्र जी, इसमें दिल पर लेने वाली क्या बात है मगर आपके चुटकुले में एक छोटा सा संशोधन ज़रूर करना चाहूँगा - यहाँ 'है' को नहीं बल्कि 'हाँ' को 'हाउ' कहा जाता है।

    By Blogger Nirav, at 12 अक्तूबर 2004 को 11:48 am  

  • नीरव जी , यह सही है कि मप्र के अलग अलग शहरो मे हिन्दी को विभिन्न तरह से तोड मरोड कर बोला जाता है किन्तु मेरा मानना है कि इससे भाषा नष्‍ट भ्रष्‍ट नही बल्कि और समृद्‍ध होती है...यहा बात सिर्फ इन्दौर के "भिया" या भोपाल के "कैसे पैसे मियाँ" पर लागू नही होती किन्तु उत्तर भारत के लगभग सभी शहरों का हिन्दी बोलने का अपना अपना अन्दाज़ है (जिसे अंग्रेजी में Accent कहते है)..
    मेरा मानने है कि यह भाषा से, या कहे अपने क्षेत्र के आदमी से अपनेपन का अह्सास करता है ठीक वैसे ही जैसे इन्दौर के नमकीन या कोटा की कचोरियाँ , या दिल्‍ली के छोले भटूरे ;-)

    By Blogger Nitin Bagla, at 10 जुलाई 2005 को 8:37 pm  

  • By Anonymous all cartoons, at 23 जून 2007 को 2:46 pm  

  • वार्तालाप स्मरण हो आई नहीं वार्तालाप स्मरण हो आया.
    परिचीत नहीं परिचित

    By Blogger Kuldeep, at 4 नवंबर 2008 को 7:49 pm  

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