नीरवता

सोमवार, अक्तूबर 18, 2004

ताजमहल पे रंग ना डालो

नवरात्री का नाम आते ही ज़ेहन में देवी की नयनाभिराम मुर्तियाँ, गरबों के अत्याधुनिक विद्युत सज्जा से सुशोभित वृहद पांडाल, ढोल और डांडीयों की लयबद्ध सुमधुर ध्वनीयों का खयाल हो आता है। मगर क्या आज इन सभी का स्वरूप उतना ही पवित्र, सादगी भरा और भक्तिमय रह गया है जैसा इनकी उत्पत्ती के समय रहा होगा? निश्चित ही नहीं, माना कि समय की छैनी हर चीज़ का स्वरूप सतत बदलती रहती है, चाहे वो हम मनुष्य हो या हमारी गढी हुई परंपरायें और रिती-रिवाज। लेकिन ये स्वाभाविक परिवर्तन चिंतनीय रूप तब धारण कर लेता है जब रिती-रिवाजों का रूप इतना विकृत हो जाय कि इनकी मुल अवधारणा ही विस्मृत होने लगे, इनके प्रागट्‌य का उद्देश्य ही धुमिल हो जाय।

रास - गरबा, जिसका हेतु कभी देवी भगवती को, नृत्य और गायन द्वारा प्रसन्न करना था, आज केवल अंग प्रदर्शन, उश्रृंखलता, वासनामय विचार और आर्थिक समृद्धि का भौंडा प्रदर्शन मात्र रह गया है। वो कर्णप्रिय संगीत जो कभी मन मे देवी के प्रति भक्ति की ज्योत को और भी प्रज्वलीत करता था, उसे आज कान के परदों को लगभग फाड ही देने वाले तेज़ संगीत ने स्थानांतरीत कर दिया है। फिल्मी, रिमिक्स गानों की तो बाढ सी आ गयी है। ध्वनी स्तर का असामान्य रूप से अधिक होना भी एक मुसीबत बन गया है। क्या देवी माँ आजकल कुछ ऊँचा सुनने लगी है? मेरा तो विश्वास है कि गरबों की शुरुआत होते देख देवी माँ भी वहाँ से चले जाने में ही भलाई समझती होगी। ऐसे में कुछ सज्जन तो माईक हाथ लग जाने पर स्वयं को अमीन सयानी या हरीश भिमानी से कम नहीं समझते। कुछ कहने को नहीं होता तो 'फलां फलां दुर्गोत्सव समिती आपका हर्दिक अभिनन्दन करती है' की ही रट लगाए रखते है।

कल ही समाचार-पत्रों मे पढा कि पारंपरिक वेष-भुषा त्याग तथाकथित आधुनिक युवतीयों ने जींस और टॉप्स में गरबा करना शुरु कर दिया है। लकडी के सीधे-साधे डांडीयों की जगह प्लास्टिक और बेयरींग वाले डांडीयों ने ले ली है। 'उत्सवधर्मी' होना कोई बुरी बात नहीं है मगर, किसी धर्मीक त्योहार की धार्मीक महत्ता से ज्यादा महत्व 'उत्सवधर्मीता' को देना ठीक नहीं है। अगर कल आने वाली पीढी हमसे इन उत्सवों का महत्व जानना चाहे तो हम बगलें झांकते नज़र नहीं आए।

बडी और जानी-मानी संस्थाओं के आयोजनों को छोड दे तो लगभग हर गली के नुक्कड पर इस तरह के कार्यक्रम होने लगे है। क्या कभी किसी ने ये सोचा है कि हर गली-मोहल्ले में, हर नुक्कड पर आयोजित किये जा रहे इन कार्यक्रमों के आयोजनकर्ता कौन है? इन 'मौसमी मेंढकों' की तरह पैदा होने वाले देवी के भक्तों की भक्ति का वर्ष भर क्या हाल रहता है? क्या ये 'भक्त' देवी के उन नौ रूपों का नाम तक बता सकते है जिन्हें नौ दिनों तक पुजा जाता है। क्या इन्हें देवी के आध्यात्मिक और शास्रोक्त स्वरूपों का तिलमात्र भी ज्ञान है?

इन आयोजनकर्ताओं मे शामिल कई युवाओं में से कुछ को तो वर्षभर कन्या विद्यालयों,कॉलेजों और छात्रावासों के इर्द-गिर्द प्रदक्षिणा लगाकर 'देवीयों' की 'भक्ति' करते और 'दर्शन लाभ' लेते हुए भी देखा जा सकता है। इनकी अत्यधिक भक्ति से 'देवीयों' के कुपित हो जाने पर, कभी-कभी इन्हें 'चरण-पादुकाओं' का अवांछित कडवा प्रसाद भी ग्रहण करना पडता है। परंतु नवरात्री में अपनी उन अधुरी अभिलाषाओं की पुर्ती का अवसर इन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता है।

इस स्थिती को सुधारने हेतु समाचार-पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया की भी महत्वपुर्ण भुमिका बहुत ज़रूरी है। आज के नये 'ट्रेंड' को प्रचारित करने के साथ ही साथ त्योहारों के परम्परागत पक्ष से भी अपने पाठकों को परिचित करवाना उनका कर्तव्य बनता है, जिसका निर्वाह कई समाचार-पत्र सफलतापुर्वक कर भी रहे है।

कम से कम धार्मीक त्योहारों को तो आधुनिकता के 'फ्लुरोसेंट' रंगो से इतना ना रंगो कि उनकी सादगी तार-तार हो जाये। जनाब खामोश ग़ाज़ीपुरी बहुत खुब कहते है -

आरीज़ों-लब सादा रहने दो
ताजमहल पे रंग ना डालो

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