tag:blogger.com,1999:blog-73630672007-06-23T14:47:08.594+05:30नीरवताNiravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comBlogger13125tag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1099138622854141572004-11-01T11:04:00.000+05:302004-11-01T12:17:24.206+05:30क्या देह ही है सब कुछ?उपभोक्तावाद और भौतिकतावाद के बढते साम्राज्य ने मनुष्य के दृष्टिकोण और सोच को बहुत ही छिछला बना दिया है। उसकी नज़रें इस चमडी की मोटाई को भेद कर अंदर की सम्पदा को देख नहीं पा रही है। <img src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" vspace="5" width="80" align="right" height="50"/>विज्ञापन एजेंसियों से लेकर फिल्मी दुनिया सभी जैसे देह तक सिमट गयी है। सभी चार्वाक दर्शन का अनुसरण कर रहे है। <br /> <br />विज्ञापनों में तो नारी देह का इतना जमकर उपयोग किया जा रहा है कि शेविंग क्रीम का विज्ञापन हो या किसी इनवर्टर का, हर जगह सुन्दर देह का होना अनावश्यक रूप से ज़रूरी होता जा रहा है। मैं इस प्रदर्शनवाद का केवल विरोधी भर नहीं हूँ अपितु मनुष्य के मनोवैज्ञानीक तलों के अध्ययन द्वारा इस विषय को समझने का पक्षधर भी हूँ। <br /> <br />मुझे लगता है कि मानव मन में सुन्दरता के प्रति सहज, स्वाभाविक आकर्षण इस गोरखधंधे का सबब रहा होगा। मैं कई बार सोचता हूँ कि हमारे सभी देवी देवता सुन्दर ही क्यों दर्शाये गये है? या हमारी दादी-नानी की कहानीयों का आगाज़ हमेंशा 'एक सुन्दर सी परी/राजकुमार... ' से ही क्यों होता है? शायद यही मुलभुत संस्कार बडे होकर, विवाहादि के समय एक सुंदर जीवन साथी की चाहत मन में जगाते है। <br /> <br />यहाँ तक तो ठीक है मगर प्रकृती ने पशु-पक्षीयों को भी सुंदरता के बोध से वंचित नहीं रखा है। 'डिस्कवरी' चैनल पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों से मालूम पडता है कि मादाएँ नर का चुनाव इसी दैहिक सुंदरता के आधार पर ही करती है। एक छोटे से बच्चे को, जिसे भाषा तक का ज्ञान नहीं होता, सुंदरता का बोध ज़रूर होता है। <br /> <br />मेरे विचारों का मंथन मुझे एक पुराण वाक्य का स्मरण कराता है - 'अति सर्वत्र वर्जयते'; सुंदरता का सभ्य, सुसंस्कृत और सादगीपुर्ण प्रस्तुतिकरण, देह भुगोल के उच्छृंखल, अमर्यादित और असभ्य प्रदर्शन से सर्वथा ही भिन्न है। आज की फिल्मों मे जिस तरह से प्रेम को केवल दैहिक परिधी तक परिभाषित किया जा रहा है, उसने निम्न पंक्तियों के माध्यम से अभिव्यक्त भावनाओं की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है <br /> <br /><blockquote>प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है <br />नये परिंदों को उडने में वक्त तो लगता है <br /> <br />जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था <br />लम्बी दुरी तय करने में वक्त तो लगता है <br /></blockquote> <br />मेरी अपनी सोच है कि इस दुनिया में जो भी कुछ अस्तित्वगत है, सभी का अपने अपने तल पर महत्व है। ईश्वर ने कुछ भी गैर ज़रूरी नहीं बनाया। मगर मनुष्य की चार्वाक दृष्टि ने कुछ नश्वर चीज़ों को अतिमहत्वपुर्ण बना दिया। <strong>जहाँ हमारे पुर्वज इस शरीर को परमार्थ साधने का एक साधन भर माना करते थे, वहीं उनके वंशज इसे सर्वोपरी महत्व देकर इसके इर्द-गिर्द ही जीवन का ताना बाना बुन रहे है।</strong> <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1098095830578093702004-10-18T15:59:00.000+05:302004-10-18T16:07:10.576+05:30ताजमहल पे रंग ना डालोनवरात्री का नाम आते ही ज़ेहन में देवी की नयनाभिराम मुर्तियाँ, गरबों के अत्याधुनिक विद्युत सज्जा से सुशोभित वृहद पांडाल, ढोल और डांडीयों की लयबद्ध सुमधुर ध्वनीयों का खयाल हो आता है। मगर क्या आज इन सभी का स्वरूप उतना ही पवित्र, सादगी भरा और भक्तिमय रह गया है जैसा इनकी उत्पत्ती के समय रहा होगा? निश्चित ही नहीं, माना कि समय की छैनी हर चीज़ का स्वरूप सतत बदलती रहती है, चाहे वो हम मनुष्य हो या हमारी गढी हुई परंपरायें और रिती-रिवाज। लेकिन ये स्वाभाविक परिवर्तन चिंतनीय रूप तब धारण कर लेता है जब रिती-रिवाजों का रूप इतना विकृत हो जाय कि इनकी मुल अवधारणा ही विस्मृत होने लगे, इनके प्रागट्‌य का उद्देश्य ही धुमिल हो जाय। <br /> <br />रास - गरबा, जिसका हेतु कभी देवी भगवती को, नृत्य और गायन द्वारा प्रसन्न करना था, आज केवल अंग प्रदर्शन, उश्रृंखलता, वासनामय विचार और आर्थिक समृद्धि का भौंडा प्रदर्शन मात्र रह गया है। वो कर्णप्रिय संगीत जो कभी मन मे देवी के प्रति भक्ति की ज्योत को और भी प्रज्वलीत करता था, उसे आज कान के परदों को लगभग फाड ही देने वाले तेज़ संगीत ने स्थानांतरीत कर दिया है। फिल्मी, रिमिक्स गानों की तो बाढ सी आ गयी है। ध्वनी स्तर का असामान्य रूप से अधिक होना भी एक मुसीबत बन गया है। क्या देवी माँ आजकल कुछ ऊँचा सुनने लगी है? मेरा तो विश्वास है कि गरबों की शुरुआत होते देख देवी माँ भी वहाँ से चले जाने में ही भलाई समझती होगी। ऐसे में कुछ सज्जन तो माईक हाथ लग जाने पर स्वयं को <em>अमीन सयानी</em> या <em>हरीश भिमानी</em> से कम नहीं समझते। कुछ कहने को नहीं होता तो 'फलां फलां दुर्गोत्सव समिती आपका हर्दिक अभिनन्दन करती है' की ही रट लगाए रखते है। <br /> <br />कल ही समाचार-पत्रों मे पढा कि पारंपरिक वेष-भुषा त्याग तथाकथित आधुनिक युवतीयों ने जींस और टॉप्स में गरबा करना शुरु कर दिया है। लकडी के सीधे-साधे डांडीयों की जगह प्लास्टिक और बेयरींग वाले डांडीयों ने ले ली है। <em>'उत्सवधर्मी'</em> होना कोई बुरी बात नहीं है मगर, किसी धर्मीक त्योहार की धार्मीक महत्ता से ज्यादा महत्व <em>'उत्सवधर्मीता'</em> को देना ठीक नहीं है। अगर कल आने वाली पीढी हमसे इन उत्सवों का महत्व जानना चाहे तो हम बगलें झांकते नज़र नहीं आए। <br /> <br />बडी और जानी-मानी संस्थाओं के आयोजनों को छोड दे तो लगभग हर गली के नुक्कड पर इस तरह के कार्यक्रम होने लगे है। क्या कभी किसी ने ये सोचा है कि हर गली-मोहल्ले में, हर नुक्कड पर आयोजित किये जा रहे इन कार्यक्रमों के आयोजनकर्ता कौन है? इन <em>'मौसमी मेंढकों'</em> की तरह पैदा होने वाले देवी के भक्तों की भक्ति का वर्ष भर क्या हाल रहता है? क्या ये 'भक्त' देवी के उन नौ रूपों का नाम तक बता सकते है जिन्हें नौ दिनों तक पुजा जाता है। क्या इन्हें देवी के आध्यात्मिक और शास्रोक्त स्वरूपों का तिलमात्र भी ज्ञान है? <br /> <br />इन आयोजनकर्ताओं मे शामिल कई युवाओं में से कुछ को तो वर्षभर कन्या विद्यालयों,कॉलेजों और छात्रावासों के इर्द-गिर्द प्रदक्षिणा लगाकर 'देवीयों' की 'भक्ति' करते और 'दर्शन लाभ' लेते हुए भी देखा जा सकता है। इनकी अत्यधिक भक्ति से 'देवीयों' के कुपित हो जाने पर, कभी-कभी इन्हें 'चरण-पादुकाओं' का अवांछित कडवा प्रसाद भी ग्रहण करना पडता है। परंतु नवरात्री में अपनी उन अधुरी अभिलाषाओं की पुर्ती का अवसर इन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता है। <br /> <br />इस स्थिती को सुधारने हेतु समाचार-पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया की भी महत्वपुर्ण भुमिका बहुत ज़रूरी है। आज के नये 'ट्रेंड' को प्रचारित करने के साथ ही साथ त्योहारों के परम्परागत पक्ष से भी अपने पाठकों को परिचित करवाना उनका कर्तव्य बनता है, जिसका निर्वाह कई समाचार-पत्र सफलतापुर्वक कर भी रहे है। <br /> <br />कम से कम धार्मीक त्योहारों को तो आधुनिकता के <em>'फ्लुरोसेंट'</em> रंगो से इतना ना रंगो कि उनकी सादगी तार-तार हो जाये। जनाब खामोश ग़ाज़ीपुरी बहुत खुब कहते है - <br /> <br /><strong>आरीज़ों-लब सादा रहने दो <br />ताजमहल पे रंग ना डालो</strong> <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1096982860000609082004-10-05T18:42:00.000+05:302004-10-05T18:57:40.000+05:30भिया(ओ), अग्गे से 'हेड' दो... हिन्दी दिवस के उपलक्ष में अभी कुछ ही दिनों पुर्व एक परिचीत से हुई वार्तालाप स्मरण हो आई। मैने उनके कथन में सत्यता पाई कि मध्य प्रदेश की अपनी कोई भाषा नहीं है। जिस प्रकार महाराष्ट्र में मराठी, गुजरात में गुजराती और दक्षिण भारतीय प्रदेशों में जितनी प्रमुखता से वहाँ की प्रादेशीक भाषाओं का उपयोग किया जाता है, वैसा भाषाई प्रेम मध्य प्रदेश में हिन्दी के प्रति नहीं दिखाई देता है। कदम कदम पर लोग अलग ही प्रकार की स्वनिर्मीत हिन्दी बोलते सुने जा सकते है। ऐसा नहीं है कि दुसरे प्रदेशों में भाषा अपने शुध्दतम स्वरूप में होती है, लेकिन उतनी नष्ट-भ्रष्ट भी नहीं होती जितनी यहाँ पर। भाषाई शुध्दता पर मेरा उतना भी दुराग्रह नहीं, जितना की ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित एक फिल्म में, धमेर्ंद्र अभिनीत चरित्र द्वारा दिखाया गया था। परंतु मै भाषायी विविधता रूपी उस अपभ्रंशता से भी सहमत नहीं हो पाता जहाँ 'भैय्या' को 'भिया(ओ)' और 'आगे' को 'अग्गे' कहा जाता हो। ऐसे शब्दों के उदाहरण कम नहीं जो अपने मुल स्वरूप से बहुत दुर जा चुके है - इनमें 'श' को 'स' उच्चारित करने वाले 'ज्ञानीजन' भी अपना योगदान देते है। माना कि ऐसे लोगों में ज़्यादातर वे ही है जिनकी शिक्षा का स्तर सामान्य से नीचे है। मगर मैने कई उच्च शिक्षित लोगों को भी इससे ग्रसित पाया है। कई लोगों के अनुसार भाषा का मुल उद्देश्य केवल भावनाओं की अभिव्यक्ती मात्र है, दुसरे शब्दों में, अगर भाषा का अपभ्रंशित रूप यदि इस उद्देश्य की पुर्ती करता है तो स्वीकार्य होना चाहिये। मैं भी निर्विरोध इस बात का पक्षधर हूँ कि एक श्रमिक को साहित्यिक भाषा का ज्ञान होना अनावश्यक है। परंतु बात जब शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत लोगों की हो तो ये अपेक्षा व्यर्थ नहीं कही जा सकती। मेरे मतानुसार अगर बचपन में ही भाषा के सही स्वरूप से माता-पिता और शिक्षक परिचीत करा सकें तो ये समस्या का सरलतम निदान होगा। इन लोगों को अपनी महत्वपुर्ण भुमिका का ज्ञान न होना ही समस्या को और भी जटिल बना रहा है। <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1094211493781678132004-09-03T17:00:00.000+05:302004-09-03T17:08:13.780+05:30मुम्बई का जीवनअपने नाम को ही चरितार्थ करते हुए, एक लम्बे अंतराल के बाद, मेरी वापसी कि मुझे प्रसन्नता है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी अपने से कई दिनों बाद फिर से मुलाकात हो रही है। ये विरह की घडीयां मैने मुम्बई मे बिताई। अपनी कम्पनी के किसी कार्य से मुझे जाना पडा था। वहां अभी भी मेरे कई साथी रहते है। <br /> <br />देखा जाय तो मुझे मुम्बई की भाग-दौड वाली जीवन शैली ज़रा भी नहीं सुहाती है। एक मशीनी जीवन - जिसे मैं कागज़ के फुलों की उपमा देना पसंद करूँगा, जो देखने में आकर्षक होते है, मुरझाते भी नहीं मगर वे जीवंतता की प्रतीक - मधुर सुवास से रहीत होते है। मै तो कायल हूँ उन फुलों का जो सुबह खिलते है और शाम को मुरझा जाते है, लेकिन अपने उस छोटे से जीवनकाल में भी, अपनी उपस्थिती शिद्दत से अनुभव कराते है। <br /> <br />छोटे शहरों मे आदमी के पास एक अवकाश, एक अंतराल होता है; वो ज़िंदगी <strong>जीता</strong> है, जबकि मुम्बई जैसे शहरों में ज़िंदगी <strong>काटी</strong> जाती है। हर इंसान एक अनजानी सी चाहत लिये अज्ञात लक्ष्य के पीछे दौडता सा दिखाई देता है। <strong>निदा फाज़ली</strong> साहब की ये ग़ज़ल मुझे बरबस ही याद आ जाती है - <br /> <br /> <br />हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी <br />फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी <br /> <br />सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ <br />अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी <br /> <br />हर तरफ दौडते-भागते रास्ते <br />हर तरफ आदमी का शिकार आदमी <br /> <br />रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ <br />हर नये दिन नया इंतज़ार आदमी <br /> <br />ज़िंदगी का मुकद्दर सफर-दर-सफर <br />आखरी सांस तक बेकरार आदमी <br /> <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1090401053469524732004-07-21T14:26:00.001+05:302004-07-21T16:28:04.053+05:30ग़ज़लों का सफ़र...<p>ग़ज़ल भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। कभी कभी ग़ज़ल के एक मिसरे में इतनी बात कह दी जाती है जो कई सफों (पन्नों) पर भी लिखी नहीं जा सकती। मिसाल के तौर पर - ग़ालिब फरमाते है <br />&nbsp; <br />हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, के हर ख्वाहिश पे दम निकले <br />बहोत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले <br />&nbsp; <br />मोहब्बत मे नहीं है, फर्क जीने और मरने का <br />उसी को देखके जीते है, जिस काफिर पे दम निकले <br />&nbsp; <br />खुदा के वास्ते पर्दा, ना क़ाबे से उठा ज़ालिम <br />कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफिर सनम निकले <br />&nbsp; <br />ये अशआर मेरे दिल के बहोत क़रीब है, और ज़िंदगी की हक़िकत बयान करते है। ऐसा नहीं है कि ग़ज़लों में उर्दु के बडे वज़नी और क्लिष्ट शब्दों का ही इस्तेमाल होता है, ग़ालिब जैसे बडे शायरों ने भी बडी ही सरल ज़बान का इस्तेमाल किया है, जैसे - <br />&nbsp; <br />उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ <br />वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है <br />&nbsp; <br />हमको मालूम है जन्नत की हक़िक़त लेकीन <br />दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' ये खयाल अच्छा है <br />&nbsp; <br />ग़ज़लों का ये रूमानी सफ़र युं ही जारी रहेगा...</p> <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1089881647877423242004-07-15T13:46:00.000+05:302004-07-21T16:25:52.986+05:30ग़ज़ल - अपनी तनहाई से गुफ्तगू ग़ज़लों के प्रति मेरा असीम प्रेम मेरे लडकपन से ही परवान चढने लगा था। मुझे अभी भी याद है, जगजीत सिंह की वो मखमली आवाज़ मुझे लगभग सम्मोहित कर देती थी। मेरे माता-पिता को आश्चर्य होता, और सच कहूँ तो मुझे भी... <br /> <br />कभी कभी तो मुझे अशाअर भी समझ नहीं आते थे। पर मैं उन लोगों में अपना शुमार करता हूँ जो यकिन करते है कि ग़ज़ल सुनने की नहीं, महसूस करने की चीज़ है। इसमें दिमाग की नहीं, दिल की ज़रूरत होती है। जो सिर्फ दिमाग का ही इस्तेमाल करते है, उनके बारे में जावेद साहब खुब फरमाते है- <br /> <br />जानता हूँ मैं तुमको, ज़ौक-ए-शायरी भी है <br />शख्सियत सजाने में, इक ये माहिरी भी है <br />फिर भी <strong>हर्फ</strong> चुनते हो, सिर्फ <strong>लफ्ज़</strong> सुनते हो <br />इनके <strong>दरमियां</strong> क्या है, तुम ना जान पाओगे... <br /> <br />कुछ लोग ग़ज़लों को केवल दर्द की अभिव्यक्ति भर मानते है, मगर वो ग़ज़लों का केवल एक ही पहलु जानते है। ग़ज़लों के अलावा मुझे नज़्म भी उतना ही सुकून पहुंचाती है। इन दोनों में तकनिकी अंतर इतना ही है कि ग़ज़ल का हर शेर भिन्न विषयों पर हो सकता है मगर नज़्म, पुरी, एक ही विषय पर कही जाती है। <br /> <br />कई ग़ज़लों में ईश्वर की ईबादत भी की जाती है, बानगी के लिए 'सजदा' एलबम की ये ग़ज़ल <br /> <br />कभी युं भी आ मेरी आँख में, के मेरी नज़र को खबर ना हो <br />मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर ना हो <br /> <br />वो बडा रहीम-ओ-क़रीम है, मुझे इतनी सिफ़त अता करे <br />उसे भुलने की दुआ करू, तो दुआ में मेरी असर ना हो <br /> <br />ग़ज़लों के बारे में जितना कहें, उतना कम, बाकी का सफर अगली किश्तों में... <br /> <br /><em>बात निकलेगी तो फिर दुर तलक जाएगी...</em> <br /> <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1089018886579790902004-07-05T14:39:00.000+05:302004-07-05T14:55:17.190+05:30पार्टी की जान...अभी हाल ही में, एक विवाह समारोह के प्रीतिभोज में आमंत्रित किया गया। मैंने सहर्ष अपनी उपस्थिती दर्ज कराई। हमेंशा की तरह मैंने अपना अवलोकन एवंम निरीक्षण प्रारंभ किया। मुझे हमेंशा से ही अपने आस-पास के लोगों के व्यक्तित्वों का निरीक्षण करना रुचिकर रहा है। मेरा विश्वास है कि कोई भी व्यक्ति, केवल अपनी उपस्थिती मात्र से ही अपने ८५ प्रतिशत व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कर देता है। <br /> <br />जल्द ही मुझे बारीकी से निरीक्षरणार्थ एक बडा ही विलक्षण व्यक्तित्व नज़र आया । अत्यधिक चौडी मुखाकृति, केशराशी मानो समुद्र की उफनती लहरों की अनुकृति, साँवली रंगत, विस्तृत ललाट के मध्य एक केशरिया तिलक, कानों मे रजत बाली, आँखों को और भी प्रभावी बनाने हेतु किंचीत अंजन का भी प्रयोग किया गया प्रतीत होता था। इस मझले कद-काठी के सज्जन ने चटक लाल रंग की कमीज़ और नीले रंग की जींस की पतलुन पहन रखी थी। साथ ही वर्तमान युग में अत्याधुनिकता का प्रतीक चालायमान फोन भी धारण किया हुआ था। हाथ की लगभग सभी उंगलीयों में बडे नगों वाली अंगुठीयाँ शोभायमान थी। ये सज्जन वार्तालाप तो अपने मित्रों से कर रहे थे, मगर उनके क्षुधातुर चक्षु खाने की मेज़ों पर सजाए जा रहे व्यंजनों पर लगे थे। वो तो प्रकृति की व्यवस्था है कि आँखों से लार नहीं टपकती अन्यथा ... <br /> <br />उनकी नेत्रों की उत्कंठता को कोई उपमा देना कठीन था । मीरा ने भी कृष्ण के दर्शन हेतु इतनी व्यग्रता कदाचित न दिखाई हो। मैंने देखा वे कई बार अपने मित्रों से भोजन आरंभ करने का औपचारिकतावश आग्रह कर चुके थे, परंतु जब उनसे और प्रतीक्षा करना कठीन हो गया तो उन्होंने अपनी मित्रता को ताक पर रखना ही उचित समझा...और चल दिये। प्रथम अवसर में ही सारे व्यंजनों से थाल भर लेने के पश्चात भी वे निश्चिंत हो जाना चाहते थे कि कहीं उनकी (निरमा वाली दिपीका जी जैसी) पारखी नज़रों से कुछ छुट तो नहीं गया है। निश्चिंत हो जाने पर, उन्होने खाना 'डकारने' का महत कार्य आरंभ किया।मैं बाध्य हूँ 'डकारने' जैसे अशिष्ठ शब्द का प्रयोग करने के लिए...क्योंकि चार निवालों का एक निवाला बना कर, मुँह में भरकर, अपनी दंतपंक्तियों को चबाने का कष्ट ना देते हुए गटक जाने की क्रिया के लिए हिंदी भाषा में इससे उपयुक्त शब्द शायद ही कोई और हो। <br /> <br />खाते खाते अघा जाने के पश्चात, उन्हें मजबूर होकर थाली रख देनी पडी। मगर भोजन से ये विमुखता उन्हें ज़्यादा देर रास न आई, और इस भोज में सर्वाधिक प्रिय ऐसे व्यंजनों की ओर फिर अपना रूख किया। पापड और मिष्ठान्न जैसे खाद्य पदार्थो से उनके करकमल फिर सुशोभित थे। इस बार अपने आस-पास खडे बच्चों पर भी उनका प्रेम छलक पडा, जो निकट ही खडे उनकी असाधारण खाने की क्षमता से अभिभुत हुए जा रहे थे। <br /> <br />इन सब बातों के अलावा उनके व्यक्तित्व के एक और उल्लेखनीय पक्ष से मेरा परिचय हुआ - उन्होंने गले में एक सोने की जंजीर पहन रखी थी जो बडे ही सुव्यवस्थित एवंम सुविचारित रूप से आधी कमीज़ के अंदर और आधी बाहर रखी गई थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा करने का औचित्य क्या था...स्पष्ट था कि जंजीर, भोज में पधारे अन्य अतिथीयों के दर्शनार्थ रखी गई थी। ये मुए आजकल के दर्ज़ी भी...इतनी ऊँची कॉलर रख देते है कि मुल्यवान वस्तुएँ कहीं छुप जाती है। जंजीर कहीं फिर से ओझल ना हो जाए इसकी भी समुचित व्यवस्था की गई थी। उसे बडे जतन से कमीज़ की दो बटनों मे मध्य से निकाला गया था। <br /> <br />संक्षेप में, यही लिखते हुए मैं अपनी लेखनी को विराम दूँगा कि जब तक वे श्रीमान वहाँ उपस्थित रहें, अनवरत प्रयासरत रहे कि प्रितीभोज कार्यक्रम की जान और शान वे ही बने रहे। <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1088163997810699252004-06-25T17:04:00.000+05:302004-06-25T17:16:37.810+05:30हाय...ये बेवफाईसुना है, आजकल जिन सॉफ्टवेअर संस्थाओं से कर्मचारी का बडी संख्या में पलायन हो रहा है, वहाँ के नियोक्ता ग़ालिब का एक शेर पढते है - <br /> <br />दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है <br />हमको <strong>उनसे</strong> वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते <strong>वफा</strong> क्या है Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1088081018102557152004-06-24T18:07:00.000+05:302004-06-24T18:13:38.103+05:30दोहरे मापदंड<a href="http://padmaja.blogspot.com/">कही अनकही</a> की लेखिका पद्मजा, जो मेरी सहकर्मी भी है, ने सुबह ही मुझे एक ई-मेल भेजा। वो आलेख एक ऐसी लडकी का वृत्तांत है, जो अपना पोस्ट ग्रेजुएशन लगभग समाप्त कर ही चुकी थी और जैसा कि सामान्यतः होता है - नौकरी की तलाश में थी। <br /> <br />उसने टाटा कम्पनी में नौकरी का विज्ञापन देखा। मगर उस विज्ञापन में एक बात विशेष रूप से उल्लेखित थी कि 'कृपया महिलाएँ आवेदन ना करें' । इस बात ने उसे आहत भी किया और क्रोधित भी। उसने भावावेश में जे. आर. डी. को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। समयाभाव के कारण पुरा वृत्तांत तो लिख नहीं सकता, संक्षेप में - उसे वो नौकरी मिल गई। <br /> <br />इस घटना नें मुझे और मेरी तनहाई को चर्चा हेतु एक विषय प्रदान कर दिया। मुझे तो उसके आहत होने पर ही आपत्ति है। अचानक लगा कि 'फिमेल ईगो' भी अस्तित्व में आ गया है। कई ऐसी नौकरीयाँ भी है जहाँ पुरुषों को भी कम प्राथमिकता दी जाती है जैसे किसी कर्यालय में 'रिसेप्शनिस्ट' या 'निजी सलाहकार' का पद। मगर शायद ही किसी पुरुष ने आपत्ति जताई हो। और फिर, कई पदों की कुछ शर्ते भी होती है जिन्हें पुरी करना महिला उम्मीदवारों के लिए तुलनात्मक रूप से ज़्यादा कठिन होती है जैसे सामान्य से ज़्यादा समय काम करना, रात्रीकालीन पाली में काम करना, सतत भ्रमण की आवश्यकता इत्यादि। <br /> <br />जो महिलाएँ सचमुच ही लिंगभेद का विरोध करती है, वो उस समय कहाँ जाती है जब संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग की जाती है, जब कई घरों में बेचारे 'वो' ही कमाने की मशक्कत करते रहते है, जब आयकर के मुल्यांकन में केवल महिला होने के आधार पर विशेष छुट का लाभ लिया जाता है, और तो और जब केवल महिला होने के आधार पर पेट्रोल पंपों और सिनेमाघरों पर लगी लम्बी कतारों में प्राथमिकता मिलती है। <br /> <br />मैं उन लोगों से बिलकुल भी सहमत नहीं हो पाता हूँ जो दोहरे मापदंडो से जीवन जीते है। <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1087979906337915842004-06-23T14:03:00.000+05:302004-06-23T14:08:26.336+05:30काव्यांजली...ओशो अपने प्रवचनों में कई बार कविताओं या शायरीयों का प्रयोग कर उन्हें और भी श्रवणीय बना देते थे, ये कविताएँ उनके चाहने वाले उन्हें भेजा करते थे, कहना न होगा, ओशो की काव्य के प्रति समझ उतनी ही अथाह थी जितना उनका 'दर्शन', प्रस्तुत है आपके रसास्वादन हेतु एक बानगी जो मुझे बेहद पसंद है- <br /> <br />बिन देखे ऐसी लगन लगी <br />दर्शन होगा तो क्या होगा <br /> <br />सुनता हूँ रूप-गर्विता है, धरती पर पाँव नहीं पडते <br />वो नशा चढा अपनेपन का, औरों पर नयन नहीं मुडते <br />सिंगार समय उसके सम्मुख, दर्पण होगा तो क्या होगा <br />बिन देखे... <br /> <br />सुनता हूँ मैं उसकी पलकें, बिन आंजे(अंजन) ही कजरारी है <br />दृग नीले इतने, सागर की गहराई जैसे पी ली है <br />जब उसकी बडरी आँखों में, अंजन होगा तो क्या होगा <br />बिन देखे... <br /> <br />सुनता हूँ उसके अधर-सुधर, फुलों को हंसी सिखाते है <br />उसकी वाणी से वर पाने, सरगम के स्वर ललचाते है <br />उन अधरों पर जब प्रेम भरा गायन होगा तो क्या होगा <br />बिन देखे... <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1087897255845348082004-06-22T15:07:00.000+05:302004-06-22T15:10:55.846+05:30समग्र स्वीकृति का अभावकल ही मैंने अपने मछलियों के जलाशय परिवार में थोडा इज़ाफा किया। मैंने दो नये सदस्यों को उसमें शामिल किया। वैसे मेरे मछलीघर का दस सदस्यीय परिवार काफी मज़े में था मगर सभी सुनहरे रंग की है और मैं एक काली भी चाहता था। काले रंग के प्रति मेरा आकर्षण कोई नया नहीं है। <br /> <br />यही मात्र ऐसा रंग है जिसपर दुजा रंग नहीं चढता। मुख्य विषय से भटकना मेरी पुरानी आदत है। खैर, जैसे ही मैंने अपनी मछलीयों का उनके नये साथियों से परिचय करवाना चाहा, मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। मैंने गौर किया कि काली मछली को स्वीकार करने में कुछ मछलियों को परेशानी हो रही थी। यहाँ तक कि वे उसे काटने की कोशिश भी करने लगी। उनकी ‘असुरक्षा की भावना’ मेरे लिए आश्चर्य का विषय थी। <br /> <br />तभी एक विचार मेरे अन्दर कौंधा - हम मनुष्यों का व्यवहार इससे सर्वथा भिन्न तो नही है, हम भी तो ऐसे लोगों को सरलता से स्वीकार नहीं कर पाते जो हमसे भिन्न हो। नये लोगों के प्रति ही नहीं वरन नई परिस्थितियों के प्रति भी हमारा यही रवैय्या रहता है। <br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1087795614909358612004-06-21T10:53:00.000+05:302004-06-21T10:56:54.910+05:30इस सप्ताहांत - हम तुमइस सप्ताहांत , फिल्म देखी गई - '<strong>हम तुम</strong>'। चलचित्र कुछ नयापन लिए हुए है, वास्तव में, मैं इसे दुबारा देख रहा था (इससे कोई ये अर्थ ना लगाए कि पहली बार मुझे फिल्म समझने में कोई दिक्कत हुई थी)। हाल ही के कई चलचित्रों की तरह इसमें हिंसा की अतिशयोक्ति भी नहीं है, और ना ही कोई उबाऊ 'फैमिली ड्रामा' । फिल्म में अजीब सी ताज़गी है और कुछ नये विषयों को छुने का साहस भी किया गया है जो प्रशंसनीय है। इसमें उन लोगों के बारे में भी कहने का प्रयास किया गया है, जो अपने 'करीयर' में कहीं इतना उलझ जाते है कि अपने परिवार की अवहेलना भी कर जाते है। लेकिन, उम्र के किसी मोड पर उन्हें अपनी इस भुल का एहसास हुए बिना नहीं रहता... Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1087636916135277422004-06-19T14:49:00.000+05:302004-06-19T18:21:12.183+05:30कुछ हर्फ...'<strong>नीरवता</strong>' जैसे विरोधाभासी शीर्षक को पढकर विस्मित होना स्वाभाविक है...दर असल, 'शब्द' का उद्‌गम तो 'नीरवता' ही माना गया है, और नीरवता की महिमा का बखान क्या करूँ, कईमशहूर शायरों ने इसके बारे में कुछ कहने का प्रयास मात्र किया है, जैसे - <br /> <br />मुँह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन <br />आवाज़ों के बाज़ारों में, खामोशी पहचाने कौन <br /> <br />और, <br /> <br />जिस तरफ जाईये, है खोखले लफ्ज़ों का हुजुम <br />कौन समझे यहाँ आवाज़ की गहराई को <br /> <br />माना शब्द 'ब्रह्म' है, मगर उस ब्रह्म को पाने के लिए भी निःशब्द की ही सहायता लेनी पडती है। शब्द में बहुत शक्ति है लेकिन <strong>नीरवता</strong> में उससे भी अधिक है। कहते है 'मुनि' शब्द का उद्‌गम भी 'मौन' से ही हुआ है, लेकिन यहाँ मौन का अर्थ 'शाब्दिक मौन' से भी कहीं गहरा है। Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.com